बैसाखी के सहारे से आत्मनिर्भरता तक: भीमा मारकंडे को सुशासन तिहार में मिली ट्राइसाइकिल, अब रोजगार की तलाश में खुद सक्षम

रायपुर, 05 मई 2026/
कहते हैं कि अगर मन में कुछ कर गुजरने का जज्बा हो, तो शारीरिक बाधाएं केवल एक पड़ाव होती हैं, मंजिल नहीं। राजनांदगांव जिले के डोंगरगांव ब्लॉक के ग्राम हरदी के रहने वाले भीमा मारकंडे की कहानी आज संघर्ष कर रहे हजारों युवाओं के लिए मिसाल बन गई है।
जब वक्त ने ली कठिन परीक्षा
भीमा की जिंदगी तब बदल गई जब हैदराबाद में निर्माण कार्य के दौरान वे ऊंचाई से गिर गए। कमर में गंभीर चोट ने उनके चलने-फिरने की शक्ति छीन ली। 80 प्रतिशत दिव्यांगता के साथ दो छोटी बेटियों (9 वर्ष और 4 वर्ष) की जिम्मेदारी उठाना किसी पहाड़ से कम नहीं था। बैसाखी ही उनका एकमात्र सहारा थी, लेकिन उनका हौसला अभी भी कायम था।
उम्मीद की नई किरण: समाज कल्याण विभाग की पहल
भीमा ने हार मानने के बजाय स्वावलंबन का रास्ता चुना। उन्होंने समाज कल्याण विभाग के माध्यम से बैटरी चलित मोटराइज्ड ट्राइसाइकिल के लिए आवेदन किया।
04 मई 2026 को मोतीपुर (राजनांदगांव) में आयोजित सुशासन तिहार में उन्हें यह आधुनिक साधन मिला — जो उनके लिए सिर्फ एक वाहन नहीं, बल्कि आजादी और आत्मनिर्भरता का प्रतीक बन गया।
मजबूरी बनी मजबूती: आत्मनिर्भरता की नई पहचान
अब बैटरी ट्राइसाइकिल और बैसाखी के सहारे भीमा के जीवन में क्रांतिकारी बदलाव आया है।
वे अब रोजगार की तलाश में दूर-दराज के क्षेत्रों तक खुद जा सकते हैं।
दूसरों पर निर्भरता खत्म होने से वे अब समाज की मुख्यधारा में सक्रिय भूमिका निभा रहे हैं।
अपनी बेटियों के बेहतर भविष्य के लिए अब भीमा शारीरिक बाधाओं से आगे निकल चुके हैं।
भीमा ने राज्य के मुख्यमंत्री विष्णु देव साय का आभार जताते हुए कहा कि सुशासन तिहार के माध्यम से आम लोगों की समस्याओं का तेजी से समाधान हो रहा है।
दिव्यांगों के लिए बड़ी राहत
समाज कल्याण विभाग की उपसंचालक वैशाली मरड़वार के अनुसार, अब 40% से 79% दिव्यांगता वाले व्यक्ति भी मोटराइज्ड ट्राइसाइकिल के पात्र होंगे।
ALIMCO (CSR मद) के माध्यम से जिले के 109 पात्र दिव्यांगों को यह सुविधा दी जाएगी — जो समावेशी विकास की दिशा में एक बड़ा कदम है।
प्रेरणा की उड़ान
भीमा मारकंडे की कहानी यह साबित करती है कि
👉 सरकारी योजनाओं का सही उपयोग
👉 और दृढ़ संकल्प
मिलकर किसी भी अंधेरे रास्ते को रोशन कर सकते हैं।
अब भीमा रुकने वाले नहीं —
वे आत्मनिर्भरता की उड़ान भरने के लिए पूरी तरह तैयार हैं।



