जहाँ थमी हिंसा, वहाँ खड़ा हो रहा भविष्य: सुकमा में 35 आत्मसमर्पित नक्सली बने राजमिस्त्री, साय सरकार की पहल रंग लाई

रायपुर, 19 दिसंबर 2025।कभी जिन हाथों में बंदूकें थीं, आज उन्हीं हाथों में औज़ार हैं। जिन रास्तों पर डर और हिंसा का साया था, वहाँ अब विकास और भरोसे की मजबूत नींव रखी जा रही है। मुख्यमंत्री विष्णु देव साय की पहल पर सुकमा जिले में आत्मसमर्पित नक्सलियों के पुनर्वास की एक नई और सकारात्मक तस्वीर सामने आई है। पुनर्वास केंद्र में रह रहे 35 आत्मसमर्पित नक्सलियों को राजमिस्त्री (मेसन) का व्यावसायिक प्रशिक्षण देकर आत्मनिर्भर बनाने की ठोस पहल की गई है।
यह प्रशिक्षण जिला प्रशासन और एसबीआई आरसेटी के संयुक्त सहयोग से संचालित किया जा रहा है। प्रशिक्षण कार्यक्रम में 15 महिलाएं और 20 पुरुष शामिल हैं। इन्हें भवन निर्माण से जुड़े सभी जरूरी तकनीकी और व्यावहारिक कौशल—नींव निर्माण, ईंट चिनाई, प्लास्टर कार्य, छत ढलाई और गुणवत्ता मानकों का चरणबद्ध प्रशिक्षण दिया जा रहा है, ताकि वे किसी भी निर्माण कार्य में दक्षता के साथ काम कर सकें।
यह पहल सिर्फ रोजगार तक सीमित नहीं है, बल्कि आत्मसमर्पित युवाओं के जीवन को नई दिशा देने का सशक्त माध्यम बन रही है। प्रशिक्षण पूरा होने के बाद ये युवा प्रधानमंत्री आवास योजना (ग्रामीण) के तहत अधूरे और नए आवासों के निर्माण में सक्रिय भूमिका निभाएंगे। इससे उन्हें स्थायी और सम्मानजनक रोजगार मिलेगा, वहीं नक्सल प्रभावित दुर्गम क्षेत्रों में कुशल राजमिस्त्रियों की लंबे समय से चली आ रही कमी भी दूर होगी।
कलेक्टर देवेश ध्रुव ने इसे सामाजिक बदलाव की दिशा में महत्वपूर्ण कदम बताते हुए कहा कि आत्मसमर्पण का वास्तविक अर्थ केवल हथियार छोड़ना नहीं, बल्कि आत्मनिर्भर बनकर समाज की मुख्यधारा में सम्मान के साथ लौटना है। जिला प्रशासन का प्रयास है कि पुनर्वास केंद्र में रह रहे युवाओं को कौशल, रोजगार और सभी मूलभूत सुविधाएं उपलब्ध कराई जाएं।
जिला पंचायत के मुख्य कार्यपालन अधिकारी मुकुन्द ठाकुर ने कहा कि प्रधानमंत्री आवास योजना–ग्रामीण सहित विभिन्न शासकीय निर्माण कार्यों के सफल क्रियान्वयन के लिए कुशल मानव संसाधन बेहद जरूरी है। यह प्रशिक्षण आत्मसमर्पित युवाओं को रोजगार और सामाजिक सरोकार से जोड़ेगा।
पोलमपल्ली निवासी पुनर्वासित पोड़ियम भीमा बताते हैं कि वे करीब 30 वर्षों तक संगठन से जुड़े रहे, लेकिन आत्मसमर्पण के बाद उनका जीवन पूरी तरह बदल गया है। “यहाँ रहने और खाने की अच्छी व्यवस्था है। पहले इलेक्ट्रीशियन मैकेनिक का प्रशिक्षण मिला, अब राजमिस्त्री का प्रशिक्षण मिल रहा है। अब मैं सम्मान के साथ काम कर सकूंगा।”
पुवर्ती निवासी मुचाकी रनवती बताती हैं कि वे 24 वर्षों तक संगठन से जुड़ी रहीं। “पुनर्वास के बाद मुझे सिलाई का प्रशिक्षण मिला, अब राजमिस्त्री का प्रशिक्षण दिया जा रहा है। हम परिवार से मिल पाए, बस्तर ओलंपिक में भाग लिया और प्रथम पुरस्कार भी जीता। शासन की योजनाओं का पूरा लाभ मिल रहा है।”
डब्बमरका निवासी गंगा वेट्टी ने कहा कि पुनर्वास के बाद उनका जीवन पूरी तरह बदल गया है। “जिला प्रशासन ने मोबाइल और राजमिस्त्री किट दी है। शिविर लगाकर आधार कार्ड, आयुष्मान कार्ड, राशन कार्ड और जॉब कार्ड बनाए गए हैं। कोई समस्या होती है तो कलेक्टर और एसपी तुरंत सुनवाई करते हैं।”
मुख्यमंत्री विष्णु देव साय ने कहा कि छत्तीसगढ़ सरकार संवाद, संवेदना और विकास के माध्यम से नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में स्थायी शांति स्थापित करने के लिए प्रतिबद्ध है। आत्मसमर्पित युवाओं को हुनर, रोजगार और सम्मान देकर समाज की मुख्यधारा से जोड़ना राज्य की पुनर्वास नीति का मूल उद्देश्य है।
सुकमा में चल रहा यह प्रयास इस बात का प्रमाण है कि संवेदनशील प्रशासन और विकासपरक योजनाओं के जरिए हिंसा के रास्ते से भटके युवाओं को नई पहचान और बेहतर भविष्य दिया जा सकता है। यही पुनर्वास की असली सफलता है और यही स्थायी शांति की मजबूत नींव।



