बिलासपुर–रायपुर हाईवे पर अवैध ढाबे और शराब दुकान नहीं हटे : हाईकोर्ट सख्त, प्रशासनिक उदासीनता पर जताई नाराजगी

बिलासपुर, 18 दिसंबर 2025/ बिलासपुर–रायपुर नेशनल हाईवे के किनारे संचालित अवैध ढाबों और शराब दुकानों को नहीं हटाए जाने पर छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने कड़ा रुख अपनाया है। चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा और जस्टिस बीडी गुरु की डिवीजन बेंच ने आदेशों के बावजूद जमीनी स्तर पर कार्रवाई नहीं होने को प्रशासनिक उदासीनता करार दिया है।
हाईकोर्ट ने कहा कि बार-बार आदेश और शपथ पत्र दिए जाने के बाद भी यदि कोई ठोस कार्रवाई नहीं होती, तो यह बेहद गंभीर मामला है। कोर्ट ने इस पर सख्त नाराजगी जताते हुए मुख्य सचिव को शपथ पत्र दाखिल करने के आदेश दिए हैं और पूछा है कि अब तक कार्रवाई क्यों नहीं की गई। मामले की अगली सुनवाई 19 दिसंबर को होगी।
सरकारी जमीन पर बना ढाबा, आदेश के बाद भी नहीं हटा
दरअसल, जनहित याचिका की सुनवाई के दौरान परिवहन विभाग के सचिव ने 25 जून 2025 को हाईकोर्ट में शपथ पत्र दाखिल कर बताया था कि बिलासपुर–रायपुर हाईवे पर मुंगेली जिले के सरगांव क्षेत्र में सड़क किनारे सरकारी जमीन पर बने ढाबे को हटाने के लिए 15 मई 2025 को तहसीलदार द्वारा बेदखली आदेश जारी किया गया है।
ढाबा संचालक ने दो महीने के भीतर जमीन खाली करने का शपथ पत्र भी दिया था और वाहनों की सुरक्षित पार्किंग व्यवस्था करने का आश्वासन दिया था।
शराब दुकान शिफ्ट करने का निर्णय भी कागजों तक सीमित
इसी तरह नगर पंचायत सरगांव की सड़क किनारे संचालित शराब दुकान को दूसरी जगह शिफ्ट करने का निर्णय लिया गया था। इसके लिए किराये पर भवन लेने की प्रक्रिया शुरू करने और नोटिस जारी करने का दावा भी किया गया, लेकिन जमीनी स्तर पर कोई बदलाव नहीं हुआ।
कोर्ट कमिश्नर की रिपोर्ट से खुली पोल
मंगलवार (16 दिसंबर) को हुई सुनवाई में कोर्ट कमिश्नर ने स्पष्ट रूप से बताया कि हाईकोर्ट के आदेश और परिवहन विभाग के सचिव के शपथ पत्र के बावजूद ढाबा और शराब दुकान अब तक नहीं हटाई गई है। वहीं, राज्य शासन की ओर से सिर्फ प्रक्रिया जारी होने की बात कही गई।
हाईकोर्ट का सख्त संदेश
हाईकोर्ट ने टिप्पणी करते हुए कहा कि अदालत को दिए गए आश्वासन लागू कराने में संबंधित विभाग असहाय नजर आ रहे हैं, जो शासन-प्रशासन की गंभीर लापरवाही को दर्शाता है।
डिवीजन बेंच ने साफ किया कि अब इस मामले में जिम्मेदारी तय होगी और मुख्य सचिव को यह बताना होगा कि आदेशों के बावजूद कार्रवाई क्यों नहीं की गई।



