झाड़-फूंक के नाम पर बर्बरता से मौत: युवती पर गर्म पानी-तेल डाला, धर्म बदलने दबाव; कोर्ट ने आरोपी महिला को सुनाई उम्रकैद सजा

गरियाबंद/रायपुर। छत्तीसगढ़ के गरियाबंद जिले में अंधविश्वास और झाड़-फूंक के नाम पर 18 साल की युवती की मौत के मामले में विशेष अदालत ने आरोपी महिला ईश्वरी साहू को उम्रकैद की सजा सुनाई है। अदालत ने माना कि बिना किसी मेडिकल योग्यता के आरोपी ने युवती का अमानवीय तरीके से इलाज किया, जिससे उसकी जान चली गई।
क्या था मामला
मृतका योगिता सोनवानी (18) मानसिक बीमारी से जूझ रही थी और उसका इलाज रायपुर व महासमुंद के अस्पतालों में चल रहा था। इसी दौरान परिवार को जानकारी मिली कि गरियाबंद जिले के सुरसाबांधा गांव में रहने वाली ईश्वरी साहू ‘देसी इलाज’ से मानसिक मरीजों को ठीक करती है। जनवरी 2025 में मां सुनीता सोनवानी अपनी बेटी को लेकर आरोपी के घर पहुंची और वहीं रहकर इलाज कराने लगी।
‘इलाज’ के नाम पर क्रूरता
आरोप है कि आरोपी महिला युवती के शरीर पर गर्म पानी और तथाकथित ‘चमत्कारी तेल’ डालती थी। वह उसके ऊपर चढ़कर पैरों से दबाव बनाती थी और लगातार ईशु मसीह की प्रार्थना करवाती थी। परिजनों के अनुसार, आरोपी कहती थी कि “ईशु मसीह पर भरोसा रखो, वही ठीक करेंगे” और इलाज के बाद धर्म बदलने का दबाव भी बनाती थी।
डराकर चुप कराया
परिवार ने अदालत में बताया कि जब युवती की हालत बिगड़ने लगी तो आरोपी ने उन्हें किसी को कुछ न बताने की धमकी दी। कहा जाता था कि अगर बात बाहर गई तो ‘प्रभु नाराज हो जाएंगे’, जिससे परिवार लंबे समय तक खामोश रहा।
मौत और जांच
इलाज के दौरान 22 मई 2025 को युवती की मौत हो गई। इसके बाद मां ने राजिम थाने में शिकायत दर्ज कराई। पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट में सामने आया कि मौत सांस रुकने से हुई और शरीर पर गंभीर चोटों के निशान थे, जो किसी भारी या भोथरी वस्तु से मारपीट जैसे थे।
अदालत का फैसला
रायपुर की विशेष एससी-एसटी अदालत ने आरोपी को हत्या के मामले में आजीवन कारावास की सजा सुनाई। इसके अलावा धर्म स्वतंत्रता कानून के तहत 1 साल, टोनही प्रताड़ना कानून की धाराओं में 1-1 साल और एससी-एसटी एक्ट के तहत भी सजा दी गई। अदालत ने कहा कि आरोपी ने अंधविश्वास और धार्मिक दबाव का सहारा लेकर पीड़िता और उसके परिवार का शोषण किया।
कानून भी हुआ सख्त
राज्य में धर्मांतरण से जुड़े मामलों को लेकर कानून और सख्त किया गया है। नए प्रावधानों के तहत बल, लालच या धोखे से धर्म परिवर्तन कराने पर 7 से 10 साल तक की सजा और जुर्माने का प्रावधान है। वहीं महिलाओं, नाबालिगों और अनुसूचित जाति-जनजाति के मामलों में सजा 10 से 20 साल तक हो सकती है।



