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जशपुर में खेती की नई क्रांति: सेब-नाशपाती की ओर बढ़े किसान, बोले—‘धान से ज्यादा मुनाफा बागवानी में’

रायपुर, 23 मई 2026 / जशपुर हमेशा फसल विविधताओं के लिए जाना जाता रहा है। यहां के किसान परंपरागत फसलों के साथ उद्यानिकी और नकद फसलों पर भी जोर दे रहे हैं। मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय जशपुर में उद्यानिकी फसलों के लिए अनुकूल वातावरण को देखते हुए किसानों को उद्यानिकी और नकद फसलों के लिए लगातार प्रोत्साहित कर रहे हैं। मुख्यमंत्री साय के निर्देश पर स्थानीय जिला प्रशासन, नाबार्ड और उद्यानिकी विभाग द्वारा इस दिशा में विशेष प्रयास किया जा रहा है। किसानों को उद्यानिकी फसलों के लिए विशेष प्रशिक्षण और तकनीकी मार्गदर्शन उपलब्ध कराया जा रहा है।

इन समन्वित प्रयासों से पिछले दो-ढाई सालों में यहां के किसान परंपरागत फसलों के स्थान पर उद्यानिकी एवं नगदी फसलों में रुचि लेने लगे हैं। जशपुर के किसान अब चाय, लीची, स्ट्रॉबेरी, नाशपाती के साथ सेब के बागान भी तैयार कर रहे हैं।

जिला प्रशासन, उद्यानिकी विभाग, रूरल एजुकेशन एंड डेवलपमेंट सोसाइटी (REDS) व नाबार्ड के समन्वित प्रयासों से जशपुर ने फलोत्पादन व बागवानी में नई पहचान बनाई है। इन पहलों से स्थानीय किसानों की आय सुदृढ़ हुई है और कृषि आधारित अर्थव्यवस्था को मजबूती मिली है।

जशपुर में सेब उत्पादन वर्ष 2023 में आरंभ हुआ। सेब की खेती अब लगभग 410 एकड़ में विस्तारित हो चुकी है, जिसमें करीब 410 किसान सेब की खेती कर रहे हैं। जिले के मनोरा व बगीचा विकासखंड तथा शैला, छतौरी, करदना और छिछली जैसे पंचायतों में लगाए गए सेब के वृक्षों ने इस वर्ष उत्कृष्ट गुणवत्ता और आकार के फल दिए हैं। स्थानीय किसान बताते हैं कि जशपुर के सेब स्वाद और गुणवत्ता के लिहाज से कश्मीर और हिमाचल के सेबों के समकक्ष हैं।

रूरल एजुकेशन एंड डेवलपमेंट सोसायटी के अध्यक्ष राजेश गुप्ता ने बताया कि जशपुर जिले के 410 किसान अपने 1-1 एकड़ जमीन पर सेब की खेती कर रहे हैं।

इसी तरह जिले में नाशपाती के बाग लगभग 3,500 एकड़ में फैले हुए हैं, जहां 3,500 से अधिक किसान नाशपाती की खेती कर रहे हैं। जिले के सन्ना, पंडरापाठ, कंवई, महुआ, सोनक्यारी, मनोरा, धवईपाई और गीधा इलाकों में बड़े पैमाने पर नाशपाती की खेती हो रही है। यहां से नाशपाती पैक कर दिल्ली, उत्तरप्रदेश और ओडिशा सहित अन्य राज्यों में भेजी जाती है।

नाशपाती का वार्षिक उत्पादन लगभग 1,75,000 क्विंटल तक पहुंच चुका है। किसानों को नाशपाती से प्रति एकड़ सालाना आमदनी लगभग 1 से 1.5 लाख रुपये तक मिल रही है।

उद्यानिकी विभाग के अधिकारियों के अनुसार राष्ट्रीय बागवानी मिशन के अंतर्गत प्रशिक्षण, तकनीकी सहयोग और बाजार तक पहुंच जैसी योजनाओं का लाभ किसानों को मिल रहा है। इससे किसान आत्मनिर्भर बन रहे हैं और फसल विविधिकरण के माध्यम से आर्थिक रूप से सशक्त हो रहे हैं।

जशपुर में चाय की खेती पहले से होती आ रही है और यहां की चाय पत्ती की गुणवत्ता भी काफी अच्छी मानी जाती है। अब सेब और नाशपाती उत्पादन के सफल विकास से जशपुर न केवल नए कृषि बाजार के रूप में स्थापित हुआ है, बल्कि स्थानीय किसानों के जीवन स्तर में भी उल्लेखनीय सुधार आया है। भविष्य में इन फसलों का दायरा और विस्तारित करने की योजना है।

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Manish Tiwari

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