बस्तर दशहरा में निभेगी 618 साल पुरानी परंपरा: 9 दिन के उपवास के बाद कांटों के झूले पर झूलेंगी पीहू, काछनदेवी देंगी पर्व की अनुमति

जगदलपुर, 10 अक्टूबर। छत्तीसगढ़ के प्रसिद्ध 75 दिवसीय बस्तर दशहरा में शनिवार को काछनगादी की महत्वपूर्ण धार्मिक रस्म निभाई जाएगी। जगदलपुर के भंगाराम चौक स्थित काछनगुड़ी में होने वाले इस अनुष्ठान में पनका समाज की 12 वर्षीय पीहू दास पर काछनदेवी सवार होंगी। इसके बाद देवी बेल के कांटों से बने विशेष झूले पर झूलकर बस्तर दशहरा मनाने की अनुमति देंगी। मान्यता है कि यह परंपरा करीब 618 साल पुरानी है।
काछनगादी की रस्म पूरी होने के बाद बस्तर दशहरा के आगामी धार्मिक कार्यक्रमों का सिलसिला आगे बढ़ेगा। इस अनूठी परंपरा को देखने के लिए बस्तर संभाग सहित अन्य क्षेत्रों से भी लोगों के पहुंचने की संभावना है।
नौ दिनों तक पूजा और उपवास करती हैं पीहू
काछनगादी की रस्म निभाने वाली पीहू दास पांचवीं कक्षा की छात्रा हैं। इस महत्वपूर्ण अनुष्ठान से पहले उन्होंने करीब नौ दिनों तक देवी की पूजा-अर्चना की और उपवास रखा। पीहू पांचवीं बार इस परंपरा में शामिल होंगी। उनसे पहले पनका समाज की अनुराधा ने करीब पांच से छह वर्षों तक यह जिम्मेदारी निभाई थी।
बस्तर दशहरा की खासियत यह है कि इसमें अलग-अलग जातियों, गांवों और परिवारों को विशेष धार्मिक जिम्मेदारियां सौंपी गई हैं। झारउमर और बेड़ाउमर गांव के ग्रामीणों को पारंपरिक रथ निर्माण की जिम्मेदारी दी गई है, जबकि काछनगादी की रस्म पनका समाज की कन्या निभाती है। ये परंपराएं कई पीढ़ियों से चली आ रही हैं।
22 पीढ़ियों से एक परिवार बना रहा कांटों का झूला
काछनगादी अनुष्ठान में इस्तेमाल होने वाला बेल के कांटों से बना विशेष झूला इस परंपरा का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा है। लामनी निवासी जगत राम नेताम का परिवार करीब 22 पीढ़ियों से इस झूले को तैयार करने की जिम्मेदारी निभा रहा है।
परिवार के सदस्य जंगल से बेल की कांटेदार डालियां लाकर पारंपरिक तरीके से झूला बनाते हैं। धार्मिक आस्था और परंपरा के प्रति समर्पण के साथ यह जिम्मेदारी पीढ़ी-दर-पीढ़ी आगे बढ़ाई जा रही है। अनुष्ठान से पहले परिवार के घर में नौ दिनों तक अखंड दीपक भी जलाया जाता है।
समय के साथ पीढ़ियां बदलती रहीं, लेकिन परिवार ने अपनी जिम्मेदारी को कायम रखा है। परिवार के सदस्यों ने इस परंपरा को भविष्य में भी जारी रखने का संकल्प लिया है।
नवरात्र से एक दिन पहले होती है काछनगादी
बस्तर दशहरा की प्रमुख रस्मों में शामिल काछनगादी हर साल नवरात्र से ठीक एक दिन पहले आयोजित की जाती है। इस दौरान बस्तर राजपरिवार के सदस्य और दशहरा समिति के पदाधिकारी काछनगुड़ी पहुंचकर काछनदेवी से दशहरा उत्सव मनाने की अनुमति मांगते हैं।
मान्यता के अनुसार, देवी की अनुमति मिलने के बाद उत्सव की अन्य रस्में आगे बढ़ती हैं और आतिशबाजी भी की जाती है। काछनदेवी को रण की देवी के रूप में भी जाना जाता है। इस परंपरा से जुड़े धार्मिक आयोजनों में पनका समाज की महिलाएं धनकुल वादन के साथ पारंपरिक गीत प्रस्तुत करती हैं।
रैला देवी की पूजा का भी विशेष महत्व
बस्तर दशहरा की धार्मिक परंपराओं में रैला देवी की पूजा का भी विशेष महत्व है। काछनगादी की रस्म के बाद जगदलपुर के गोल बाजार में रैला देवी की पूजा का विधान है। इस दौरान स्थानीय श्रद्धालुओं के साथ बस्तर संभाग और दूसरे राज्यों से आने वाले लोग भी धार्मिक आयोजनों में शामिल होते हैं।
12 अक्टूबर को होगी जोगी बिठाई की रस्म
काछनदेवी से अनुमति मिलने के बाद बस्तर दशहरा की अगली महत्वपूर्ण रस्म जोगी बिठाई आयोजित की जाएगी। इसके साथ ही कलश स्थापना सहित आगामी धार्मिक कार्यक्रमों का सिलसिला आगे बढ़ेगा। इन आयोजनों में विभिन्न समुदायों, गांवों और परिवारों की भागीदारी रहती है। सदियों से चली आ रही इन परंपराओं को स्थानीय लोग अपनी सांस्कृतिक पहचान और आस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा मानते हैं।
पाट जात्रा से शुरू हुआ 75 दिवसीय बस्तर दशहरा
बस्तर दशहरा की शुरुआत 12 अगस्त को पाट जात्रा की रस्म के साथ हुई थी। इस दौरान पारंपरिक लकड़ी के पाट की पूजा-अर्चना की गई। मां दंतेश्वरी की आराधना से जुड़े इस पर्व में अलग-अलग चरणों में कई विशिष्ट धार्मिक अनुष्ठान आयोजित किए जाते हैं।
बस्तर दशहरा अपनी लंबी अवधि, विशिष्ट रस्मों और जनजातीय परंपराओं के कारण देशभर में अलग पहचान रखता है। यहां दशहरा केवल एक धार्मिक उत्सव नहीं, बल्कि सदियों पुरानी सांस्कृतिक विरासत और सामुदायिक एकता का प्रतीक भी है।



