
006 गायों से शुरू हुआ डेयरी का सफर, आज 25 उन्नत पशुओं के साथ लिख रहे सफलता की इबारत
रायपुर, 29 अप्रैल 2026/ दंतेवाड़ा जिले में दुग्ध उत्पादन के क्षेत्र में हो रही अभूतपूर्व वृद्धि बस्तर संभाग में एक नई ‘श्वेत क्रांति’ का संकेत दे रही है। कभी संघर्षों के लिए पहचाने जाने वाले इस अंचल में अब पशुपालन और डेयरी व्यवसाय ग्रामीण आत्मनिर्भरता का मुख्य आधार बन रहे हैं। छत्तीसगढ़ सरकार के प्रयासों से न केवल किसानों की आर्थिक स्थिति सुदृढ़ हो रही है, बल्कि यह पहल स्थानीय स्तर पर कुपोषण के विरुद्ध लड़ाई में भी एक महत्वपूर्ण कड़ी साबित हो रही है।
मजदूरी से ‘मल्टी-फार्मिंग’ तक का प्रेरणादायक सफर
दंतेवाड़ा के गीदम विकासखंड के ग्राम गुमड़ा के रहने वाले 36 वर्षीय ललित यादव की कहानी अटूट साहस और संघर्ष की मिसाल है। एक समय था जब ललित अपनी आजीविका के लिए दूसरों के खेतों और निर्माण कार्यों में मजदूरी करने को विवश थे। वर्ष 2013 में उन्होंने महज 6 गायों के साथ पशुपालन की शुरुआत की। आज उनके वैज्ञानिक दृष्टिकोण और कड़ी मेहनत का परिणाम है कि उनके पास 25 गायों का आधुनिक डेयरी फार्म है।

तकनीक और उन्नत नस्लों से आया बड़ा बदलाव
ललित की सफलता का मुख्य आधार पारंपरिक खेती के साथ आधुनिक तकनीक का समावेश है:
- उन्नत नस्लें: पशुपालन विभाग के मार्गदर्शन में उन्होंने जर्सी और HF क्रॉस जैसी उन्नत नस्लों को अपनाया।
- दुग्ध उत्पादन: वर्तमान में उनके फार्म से प्रतिदिन 70 से 80 लीटर दूध का उत्पादन हो रहा है, जो ₹70 प्रति लीटर की दर से बाजार में बिक रहा है।
- चारा प्रबंधन: उन्होंने नेपियर घास की खेती शुरू की, जिससे सालभर पशुओं को पौष्टिक चारा उपलब्ध रहता है और लागत में कमी आई है।
‘मल्टी-फार्मिंग’ मॉडल: आय के विविध स्रोत
ललित ने केवल डेयरी तक सीमित न रहकर एक सफल ‘मल्टी-फार्मिंग मॉडल’ तैयार किया है:
- कुक्कुट पालन और सब्जी उत्पादन से नियमित नकद आय
- दूध से उच्च गुणवत्ता वाला पनीर निर्माण, जो ₹400 प्रति किलो बिकता है
- फार्म के गोबर से तैयार जैविक खाद, जिसकी मांग अन्य जिलों में भी, ₹3000 से ₹3500 प्रति ट्रैक्टर तक है
शासन योजनाओं और पारिवारिक संस्कारों का संगम
ललित की प्रगति में सरकारी योजनाओं और बैंकिंग सुविधाओं का महत्वपूर्ण योगदान रहा। उन्होंने डेयरी शेड और फेंसिंग के लिए लिए गए 3 लाख रुपये के बैंक ऋण को समय से पहले चुका कर अपनी आर्थिक अनुशासन और व्यावसायिक कुशलता का परिचय दिया है।
वे अपनी सफलता का श्रेय अपनी माता के संघर्ष और संस्कारों को देते हैं। उनकी माँ एक आंगनबाड़ी सहायिका रही हैं, जिन्होंने कठिन परिस्थितियों में भी उन्हें शिक्षा दिलाई।
आज ललित यादव न केवल आत्मनिर्भर हैं, बल्कि पूरे क्षेत्र के किसानों के लिए एक प्रेरणादायक प्रकाश स्तंभ बनकर उभरे हैं। उनकी कहानी यह साबित करती है कि सही मार्गदर्शन, ईमानदारी और मेहनत से ग्रामीण अंचलों में भी समृद्धि और आत्मनिर्भरता का नया अध्याय लिखा जा सकता है।



