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कांकेर में धर्मांतरण विवाद: 14 गांवों में पादरियों की एंट्री बैन, हाईकोर्ट ने भी ग्राम सभा के फैसले को माना सही

कांकेर, 7 नवंबर 2025/ छत्तीसगढ़ के कांकेर जिले में धर्म परिवर्तन की घटनाओं के बाद अब 14 गांवों में पास्टर और पादरियों के प्रवेश पर रोक लगा दी गई है। ग्रामीणों का कहना है कि यह कदम उन्होंने अपनी परंपरा और संस्कृति की रक्षा के लिए उठाया है। इन गांवों की कुल आबादी करीब सात हजार है।

जानकारी के मुताबिक, जामगांव में ही 14-15 परिवारों ने अघोषित रूप से ईसाई धर्म अपना लिया है। इसके बाद से ही आदिवासी समुदाय और धर्म परिवर्तन कर चुके परिवारों के बीच दूरी बढ़ गई है।

हाईकोर्ट ने भी दिया ग्राम सभा के पक्ष में फैसला

छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने इन ग्राम सभाओं के फैसले को चुनौती देने वाली याचिका को खारिज कर दिया है। कोर्ट ने माना कि जबरन या प्रलोभन देकर धर्मांतरण रोकने के लिए लगाए गए ये बोर्ड असंवैधानिक नहीं हैं, बल्कि स्थानीय संस्कृति की रक्षा के लिए ग्राम सभा का एहतियाती कदम हैं।

महिलाओं के बिंदी-चूड़ी छोड़ने से शुरू हुआ विवाद

जामगांव की सरपंच भगवती उइके ने बताया कि गांव में कुछ महिलाओं ने बिंदी और चूड़ियां पहनना बंद कर दिया था। यह देखकर ग्रामीणों को शक हुआ। बाद में पता चला कि इन महिलाओं ने ईसाई धर्म अपनाया है। कुछ बाहरी लोग गांव में आते थे, जो प्रार्थना के बाद “दुआ पानी” और “तेल” से इलाज का दावा करते थे।

धीरे-धीरे गांव में तीज-त्योहार और देवपूजा छोड़ने वालों की संख्या बढ़ने लगी। तब ग्राम सभा ने बैठक कर फैसला लिया कि परंपरा की रक्षा के लिए बाहरी पास्टर-पादरियों के प्रवेश पर रोक लगाई जाएगी।

दो बोर्ड, दो अर्थ – आस्था और विरोध आमने-सामने

भास्कर की टीम जब जामगांव पहुंची तो गांव की सीमा पर दो बोर्ड दिखे।
पहले बोर्ड पर लिखा था – “यह पांचवीं अनुसूची क्षेत्र है, पास्टर, पादरी और धर्मांतरित व्यक्तियों का प्रवेश वर्जित है।”
वहीं, पास में लगे दूसरे बोर्ड पर लिखा था – “डायोसिस ऑफ चर्च ऑफ गॉड।”
अब दोनों बोर्ड गांव में आस्था और विरोध के प्रतीक बन चुके हैं।

ईसाई समुदाय बोला – अब रिश्तेदार भी नहीं आते

जामगांव के चर्च के पास्टर पतिराम नेताम ने बताया कि अब उनके अपने रिश्तेदार भी उनसे मिलने नहीं आते, क्योंकि उनके गांवों में भी ऐसे ही बोर्ड लगा दिए गए हैं।

कुड़ाल से शुरू हुआ अभियान, अब 14 गांवों में फैला

यह विरोध आंदोलन कांकेर जिले के कुड़ाल गांव से अगस्त 2025 में शुरू हुआ था। वहां ग्राम सभा ने प्रस्ताव पास किया कि गांव की सीमा में कोई पास्टर या पादरी नहीं आएगा।
इसके बाद यह निर्णय परवी, जनकपुर, भीरागांव, घोडागांव, जुनवानी, हवेचुर, घोटा, घोटिया, सुलंगी, टेकाठोडा, बांसला, जामगांव, चारभाठा और मुसुरपुट्टा तक फैल गया।

हर गांव की सीमा पर एक समान बोर्ड लगाए गए हैं, जिनमें लिखा है कि “ये बस्तर की परंपरा के गांव हैं, पेशा अधिनियम 1996 के तहत ग्राम सभा को अपनी संस्कृति की रक्षा का अधिकार है।”

कफन-दफन विवाद से भड़की थी आग

विवाद की जड़ 26 जुलाई 2025 की घटना को माना जा रहा है। जामगांव निवासी सोमलाल राठौर की मौत के बाद परिवार ने 27 जुलाई को ईसाई रीति से अपने खेत में दफन किया। ग्रामीणों को जब इसकी जानकारी मिली, तो भारी विरोध हुआ। अगले दिन भीड़ ने गांव के चर्च में तोड़फोड़ की।

इसके बाद ग्राम सभा ने सर्वसम्मति से प्रस्ताव पास किया कि गांव की परंपरा और सामाजिक समरसता बनाए रखने के लिए पास्टर-पादरियों के प्रवेश पर प्रतिबंध रहेगा।


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Manish Tiwari

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