BSNL अधिकारी संजय कुमार शर्मा बरी: हाईकोर्ट ने 2007 की सजा रद्द की, कहा– ‘सिर्फ रकम की बरामदगी से दोष सिद्ध नहीं’

बिलासपुर, 16 फरवरी 2026।छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने सीबीआई की विशेष अदालत द्वारा वर्ष 2007 में सुनाई गई सजा को निरस्त करते हुए पूर्व बीएसएनएल सब-डिविजनल ऑफिसर संजय कुमार शर्मा को रिश्वत मामले में बरी कर दिया है। अदालत ने स्पष्ट कहा कि केवल रकम की बरामदगी के आधार पर किसी आरोपी को दोषी नहीं ठहराया जा सकता, जब तक यह साबित न हो कि उसने रिश्वत की मांग की थी।
हाईकोर्ट की एकलपीठ में न्यायमूर्ति रजनी दुबे ने मामले की सुनवाई करते हुए कहा कि अभियोजन पक्ष रिश्वत की मांग और स्वीकार किए जाने को ठोस साक्ष्यों से साबित करने में असफल रहा है। इसी आधार पर वर्ष 2007 में दी गई सजा को रद्द कर आरोपी को दोषमुक्त कर दिया गया।
क्या था मामला?
सीबीआई के अनुसार, 20 जून 2003 को बिलासपुर में पदस्थ बीएसएनएल के एसडीओ संजय कुमार शर्मा को 40 हजार रुपये लेते हुए रंगे हाथों पकड़ा गया था। आरोप था कि उन्होंने अक्षय कंस्ट्रक्शन के संचालक एवं ठेकेदार के.पी. अग्रवाल से लंबित बिलों के भुगतान के एवज में 80 हजार रुपये की मांग की थी। यह राशि कथित तौर पर रिश्वत की पहली किस्त बताई गई थी।
गवाही कमजोर, प्रतिपरीक्षण नहीं हो सका
सुनवाई के दौरान बचाव पक्ष ने दलील दी कि शिकायतकर्ता के.पी. अग्रवाल का ट्रायल के दौरान निधन हो गया था, जिससे उनका प्रतिपरीक्षण (क्रॉस-एग्जामिनेशन) संभव नहीं हो पाया। अदालत ने माना कि प्रतिपरीक्षण के अभाव में गवाही की कानूनी मजबूती कमजोर हो जाती है।
इसके अलावा, शिकायतकर्ता के पुत्र उमेश अग्रवाल सहित अन्य गवाहों ने भी अभियोजन का समर्थन नहीं किया। एक अन्य ठेकेदार सूर्यदेव दुबे की गवाही को महत्वपूर्ण माना गया, लेकिन वे भी रिश्वत की मांग को स्पष्ट रूप से साबित नहीं कर सके।
हाईकोर्ट की अहम टिप्पणी
अदालत ने कहा कि रिश्वत मामलों में केवल पैसे की बरामदगी पर्याप्त नहीं होती। अभियोजन को यह सिद्ध करना आवश्यक है कि आरोपी ने स्पष्ट रूप से रिश्वत की मांग की और उसे स्वीकार किया। चूंकि इस मामले में मांग के ठोस प्रमाण प्रस्तुत नहीं किए जा सके, इसलिए आरोपी को संदेह का लाभ दिया गया।
19 साल बाद मिली राहत
करीब 19 साल पुराने इस मामले में हाईकोर्ट के फैसले से संजय कुमार शर्मा को बड़ी राहत मिली है। वर्ष 2007 में सीबीआई की विशेष अदालत ने उन्हें दोषी ठहराते हुए सजा सुनाई थी, जिसे अब रद्द कर दिया गया है।
यह फैसला एक बार फिर यह स्थापित करता है कि आपराधिक मामलों में दोष सिद्ध करने के लिए ठोस और निर्विवाद साक्ष्य आवश्यक हैं, केवल परिस्थितिजन्य साक्ष्य या रकम की बरामदगी पर्याप्त नहीं मानी जा सकती।



