रायपुर साहित्य उत्सव 2026: वाचिक परम्परा पर मंथन, लोक स्मृति को साहित्य की जीवित धारा बताया

00वाचिक परम्परा अतीत नहीं, बल्कि वर्तमान और भविष्य को समझने की सशक्त चाबी है00
रायपुर, 24 जनवरी 2026/
रायपुर साहित्य उत्सव 2026 के अंतर्गत “आदि से अनादि तक” थीम पर आयोजित साहित्यिक सत्रों की श्रृंखला में लाला जगदलपुरी मण्डप में द्वितीय सत्र का आयोजन किया गया। “वाचिक परम्परा में साहित्य” विषय पर केंद्रित इस सत्र में भारतीय साहित्य की मौखिक परम्पराओं की ऐतिहासिक भूमिका, सांस्कृतिक महत्व और समकालीन प्रासंगिकता पर गहन एवं विचारोत्तेजक परिचर्चा हुई।
परिचर्चा में प्रख्यात साहित्यकार रुद्रनारायण पाणिग्रही, शिव कुमार पांडे, डॉ. जयमती और सुधीर पाठक ने सहभागिता करते हुए वाचिक परम्परा की विविध विधाओं और उसके साहित्यिक योगदान पर अपने विचार साझा किए। सत्र की अध्यक्षता वरिष्ठ साहित्यकार डॉ. महेन्द्र मिश्र ने की।
अध्यक्षीय उद्बोधन में डॉ. महेन्द्र मिश्र ने कहा कि वाचिक परम्परा केवल अतीत की विरासत नहीं, बल्कि समाज और समकालीन साहित्य को समझने की एक जीवंत प्रक्रिया है। उन्होंने जोर देते हुए कहा कि तेजी से बदलते समय में लोक स्मृतियों का संरक्षण, उनका दस्तावेजीकरण और नई पीढ़ी तक संवेदनशील हस्तांतरण आज की सबसे बड़ी सांस्कृतिक जिम्मेदारी है।
वक्ताओं ने कहा कि लोकगीत, लोककथाएं, मिथक, कहावतें और जनश्रुतियां भारतीय साहित्य की मूल आत्मा हैं। लिखित साहित्य के अस्तित्व में आने से पहले वाचिक परम्परा ही ज्ञान, इतिहास, जीवन मूल्यों और सामाजिक अनुभवों के संप्रेषण का प्रमुख माध्यम रही है, जिसने पीढ़ी दर पीढ़ी सांस्कृतिक चेतना को जीवित रखा।
परिचर्चा के दौरान इस बात पर भी सहमति बनी कि डिजिटल युग में वाचिक परम्पराओं के संरक्षण के नए अवसर सामने आए हैं, जिनका रचनात्मक और जिम्मेदार उपयोग कर लोक साहित्य को वैश्विक पहचान दिलाई जा सकती है।



