इक्कीस फिल्म रिव्यू: 21 साल की उम्र में शहीद हुए अरुण खेत्रपाल की रोंगटे खड़े कर देने वाली कहानी, धर्मेंद्र की आखिरी फिल्म में जज्बा, जंग और बलिदान का तूफान

मुंबई। 1971 के भारत-पाक युद्ध में बासंतर की ऐतिहासिक लड़ाई के नायक रहे शहीद सेकेंड लेफ्टिनेंट अरुण खेत्रपाल की जिंदगी पर बनी फिल्म ‘इक्कीस’ दिल को छू लेने वाली देशभक्ति और भावनाओं से भरी कहानी पेश करती है। निर्देशक श्रीराम राघवन ने इस फिल्म के जरिए एक ऐसे वीर को श्रद्धांजलि दी है, जिसने महज 21 साल की उम्र में देश के लिए सर्वोच्च बलिदान दिया।
फिल्म का सबसे मार्मिक क्षण तब आता है, जब ब्रिगेडियर मदन लाल खेत्रपाल (धर्मेंद्र) अपने बेटे की तस्वीर दिखाते हुए कहते हैं—
“यह छोटा बेटा अरुण… यह हमेशा इक्कीस का ही रहेगा।”
इस संवाद के साथ ही पूरा सिनेमा हॉल भावनाओं से भर उठता है।
कैसी है ‘इक्कीस’ की कहानी?
फिल्म की शुरुआत अरुण खेत्रपाल के 21वें जन्मदिन से होती है। यंग ऑफिसर्स कोर्स कर रहे अरुण को अचानक युद्ध के हालात के बीच अपनी रेजिमेंट में लौटने का आदेश मिलता है। वहीं से उसकी देशभक्ति, कर्तव्य और बलिदान की यात्रा शुरू होती है।
कहानी एक समानांतर ट्रैक पर 30 साल आगे बढ़ती है, जहां 80 वर्षीय मदन लाल खेत्रपाल पाकिस्तान के सरगोधा में अपने पुराने घर जाते हैं। उनकी मेजबानी पाकिस्तानी ब्रिगेडियर जान मोहम्मद निसार (जयदीप अहलावत) करता है, जो किसी अनकहे ‘सच’ को उजागर करना चाहता है। यही रहस्य फिल्म को भावनात्मक गहराई देने की कोशिश करता है।
युद्ध, जज़्बा और बलिदान
मोर्चे पर अरुण को शुरुआत में लड़ाई से दूर रखा जाता है, लेकिन सूबेदार सगत सिंह (सिकंदर खेर) के मार्गदर्शन में वह खुद को साबित करता है और अंततः टैंक यूनिट के साथ युद्ध में उतरता है। बासंतर की लड़ाई के दृश्य फिल्म के सबसे ताकतवर हिस्से हैं, जहां अरुण का अदम्य साहस दर्शकों को रोमांचित और भावुक कर देता है।
तकनीकी पक्ष
- सिनेमेटोग्राफी: अनिल मेहता ने युद्ध के दृश्यों को शानदार विजुअल्स में बदला है
- एडिटिंग: मोनिशा आर बलदावा की कसी हुई एडिटिंग कहानी को बांधे रखती है
- संगीत: कैलाश खेर का गाया गीत ‘दुनिया वो शतरंज’ फिल्म की आत्मा को मजबूत करता है
- बैकग्राउंड स्कोर भावनाओं को और गहराता है
अभिनय में कौन रहा सबसे प्रभावी?
- धर्मेंद्र ने अपने करियर की आखिरी फिल्म में बेहद संवेदनशील और गरिमामय अभिनय किया है
- जयदीप अहलावत ने पाकिस्तानी अफसर के किरदार में गहरी छाप छोड़ी
- अगस्त्य नंदा ने अरुण खेत्रपाल के किरदार में मासूमियत, जोश और देशभक्ति को संतुलित रूप से निभाया
- सिकंदर खेर फिल्म का सरप्राइज पैकेज साबित होते हैं
कमज़ोरियां भी हैं
फिल्म का पहला हाफ थोड़ा धीमा है। अरुण और किरण की प्रेम कहानी प्रभावी नहीं बन पाती। कुछ सब-प्लॉट और किरदार अनावश्यक लगते हैं, जिससे कहानी थोड़ी भटकती है।
फैसला
कुछ कमियों के बावजूद ‘इक्कीस’ एक ऐसे सच्चे योद्धा को याद करने की ईमानदार कोशिश है, जिसने हंसते-हंसते देश के लिए जान दे दी।
यह फिल्म सिर्फ एक वॉर ड्रामा नहीं, बल्कि एक अमर शहीद को भावभीनी श्रद्धांजलि है।
⭐ रेटिंग: 3/5



